| 1. | पाणिनिसूत्रानुसार दिशावाचक और संख्यावाचक शब्दों का कर्मधारय समास तभी
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| 2. | यह शब्द कर्मधारय समास है, जिसका विच्छेद ‘ नरश्चासौ आशंसः ' अर्थात प्रशंसित मनुष्य होगा।
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| 3. | 52) अर्थात् ‘ संख्या पूर्वक कर्मधारय समास द्विगु कहलाता हैं, ऐसा पाणिनि का सूत्रा हैं।
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| 4. | म्हणून श्रीमद्भगवत् हा सामासिक शब्द “श्रीमान् भगवान्” असा विशेषण हे पूर्वपद असणारा कर्मधारय समास असा विग्रह ग्राह्य होतो.
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| 5. | उत्तरपद प्रधान हो और पूर्ववद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है।
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| 6. | जिस समास का उत्तरपद प्रधान हो और पूर्ववद व उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य अथवा उपमान-उपमेय का संबंध हो वह कर्मधारय समास कहलाता है।
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| 7. | ४. कर्मधारय समास:-जो समास विशेषण-विशे श्य और उपमेय-उपमान से मिलकर बनते है,उन्हें कर्मधारय समास कहते है ।
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| 8. | ४. कर्मधारय समास:-जो समास विशेषण-विशे श्य और उपमेय-उपमान से मिलकर बनते है,उन्हें कर्मधारय समास कहते है ।
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| 9. | ] बल्कि जब ‘ त्रिखर्व ' शब्द को संख्यावाचक मानते हैं तभी त्रि शब्द का खर्वशब्द के साथ कर्मधारय समास नहीं हो सकता।
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| 10. | ' नराशंस' शब्द कर्मधारय समास है, जिसका विच्छेद 'नरश्चासौ आशंसः' अर्थात 'प्रशंसित मनुष्य' होगा, इसलिए 'नराशंस' शब्द से किसी देवता को भी न समझना चाहिये।
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